मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

मेहँदी रचे हाथ ,चूड़ी भरी कलाइयां,समुद्र का किनारा और शॉर्ट स्कर्ट



  जी हाँ अभी पिछले हफ्ते मैं इसी माहौल में ५-६ दिनों तक रही.  पिछले  हफ्ते मैं अपने पति देव के साथ अंदमान गयी थी। हम एक कंडक्टेड टूर पर थे,जिसमे कुछ लोगो का ग्रुप बना हुआ था। हम जिस ग्रुप में थे उसमे नवविवाहित जोड़े ही अधिकतर थे। शादी का लग्न मुहूर्त बस समाप्त ही हुआ था ,सब ३-४ दिन पुराने दंपत्ति थे। हम जैसे दो चार लोग ही थे जो २५-२६ साल पुराने जोड़े थे। अंदमान के बेहद ख़ूबसूरत समुद्री किनारे इन बच्चों के चहचहाट से और दिलकश हो उठे थे। भारत के अलग अलग प्रांतों से आयीं ये नयी नवेली दुल्हनों कि हथेलियाँ चटक मेहँदी से सुर्ख थी ,कलाइयां लाल चूड़ो से भरी हुईं ,किसी के गले में मंगल सूत्र ,तो किसी कि मांग नारंगी रंग के सिन्दूर से भरीं हुई पर सभी बिलकुल  आधुनिक और छोटे कपड़ों में। एक अलग दिलकश नजारा था। पहले दिन तो कुछ बच्चियां बिलकुल हाई पेंसिल हील में निकली ,पर दो के  उस दिन पैर मुड़ गएँ और मोच आ गयी। अलग  अलग  नए जोड़े ,हर जोड़ा दूसरे से अलग। मैं कनखियों से उन्हें भांप रही थी। ……मज़े  लेती थी।

    बेजोड़ जोड़ा -बिलकुल एक दुसरे के लिए मानों बने हों ,बेशर्म जोड़ा -सबके सामने बेशर्मी से लिपटे हुए ,शर्मीला जोड़ा,समझदार जोड़ा ,लम्बे जोड़े या फिर झगड़ालू जोड़े -जो आपस में झगड़ते रहते। एक जोड़ा था जो पहले दिन दूर बैठा बिना सटे पूरब पश्चिम देखता हुआ -अनजान जोड़ा ,पर पांचवे दिन हाथ में हाथ डाले मुस्कुराते हुए देख रही थी ( यानि पहले दिन" अजनबी कौन हो तुम " से हम बने तुम बने एक दूजे के लिए " का सफ़र तय हो चुका था ). इसी तरह हम अनुमान लगते कि इनका प्रेम विवाह है या अर्रेंज।
   सभी जीवन कि राह में एक नया रंग भरते हुए अपनी वैवाहिक जीवन क़ी शुरुआत कर रहें थे। एक अच्छा अनुभव रहा।
     

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

बदलाव



सविता जी,की चिंता छुपाये नहीं छिप रही थी। हैरान परेशां सुबह से इधर उधर हो रहीं थी ,क्या पहनू कैसे बाल बाँधू या फिर खुले छोड़ दूँ ?जूते पहनूँ या सैंडल। साडी ठीक रहेगा या सलवार कुरता ,उलझन बढ़ती जा रही थी। बार बार बेटी के कमरे में झांक रहीं थी ,वह अभी तक सोयी ही पड़ी थी। सच पूछा  जाये  तो जब से पता चला था कि उन्हें होटल अम्बरविला जाना है ,उनके मन में अशांति का ज्वार  फूटा हुआ था। आठ दिनों से ठीक से नींद नहीं आ रही थी। दो रात से अपने पति को भी रात में करवटें बदलते देख रही थी। देखूं ये क्या कर रहें हैं करते इनके तरफ झाँका ,ये बाल काले कर रहें थे। सविता को  हंसी आ गयी ,अब आप बाल क्यों रंग रहें है ?देखो सफेदी झलक रही थी,सोचा रिस्क क्यूँ लेना। मतलब कश्मकश इधर भी चल रही है। उफ्फ !! पिंकी तुम उठ क्यूँ नहीं रही हो ,मेरी जान निकली  जा रही है डर से.....सविता ने मन में बुदबुदाया।
          पिंकी अपने वक़्त से ही उठी ,सविता ने  अपनी बेचैनी का पूरा हाल सुनाया। डोन्ट वरी मम्मा ……सब ठीक होगा। तुम जैसी हो वैसी ही रहो। माँ के   चेहरे के भाव पड़ते हुए फिर बोली अच्छा ये ब्लू साड़ी पहन लो और जूड़ा बना लो तुम पर फबता है। अपने पापा को भी कुछ टिप्स देती हुई बाथरूम में घुस गयी।

    नियत समय से आधा घंटा पहले वे लोग अम्बरविला पहुँच चुके थे। वो लोग भी  बिलकुल वक़्त पर पहुंचे। पिंकी ने माँ कि हथेली को हल्का सा दबाया और मानों उसे एक आत्मबल का संचार हो गया।कुछ ही क्षणों के बाद  होटल में  सब यानि पिंकी के माता पिता और निलेश के माता पिता छोटी बहन और दादा जी एक टेबल के चारो ओर बैठ ठहाके लगा रहें थे। सविता नज़रों से लोगो के भाव पढ़ने का यत्न कर रही थी। तभी निलेश कि माँ ने पिंकी से कहा तब बेटा तुम्हे हमसब कैसे लगे?सविता का मुहँ खुला रह गया ,कि कहीं लड़केवाले ऐसा पूछ सकते हैं .......

   अभी दो महीने पहले एक वैवाहिक विज्ञापन के जरिये उनलोगो का आपस में संपर्क हुआ था ,आज पहली बार आपस में मिलने से पहले दोनों पक्ष एकदूसरे के बारे अच्छी जानकारी हासिल कर चुके थे। निलेश के माता पिता पिंकी से उसकी पढाई नौकरी ,भविष्य कि प्लानिंग पूछ रहें थे। घर से चलने के वक़्त पिंकी ने वही कुर्ती पहना  था  जिसे पहन पिछले दिनों अपनी सहेली के घर गयी थी यानि बेहद ओपचारिक वेश भूषा। सभी आपस में खुल कर बात कर रहें थे। निलेश हंसमुख स्वाभाव का लग रहा था। वह हँसते हुए अपनी माँ को कहने लगा कि अब तो कोई घबराहट नहीं हैं न माँ ,जानती हैं सविता आंटी यहाँ आने से पहले सब डरे हुए थे कि इतनी पढ़ी - लिखी लड़की है जाने कैसा व्यवहार होगा। …। आपलोग के लिए भी तरह तरह के विचार आ रहें थे। सविता सोचने लगी अरे यही  हाल तो हमारा भी था। …… वातावरण हल्का होते गया ,मन मयूर नाचने लगा।

२५-३० साल पहले  कि सविता को लड़की दिखाने   कि अपनी यंत्रणा याद आ गयी ,शायद जमाना बदल रहा है। …… …


 









मंगलवार, 26 नवंबर 2013

आरुषि मर्डर की गुत्थी

आरुषि मर्डर की  गुत्थी 

  आज आरुषि हत्या कांड की गुत्थी को सुलझाने का दावा करती हुई कोर्ट कि ओर से फैसला आ गया और पिता को दोषी और माँ को हत्या में सहयोगी समझते हुए आजीवन कारावास कि सजा सुनाई गयी। 

  पता नहीं दिल ये स्वीकार कर ही नहीं पा रहा है पढ़े -लिखे डॉक्टर दंपत्ति ऐसा कर गुजरेंगे। कोर्ट के फैसले को यदि सच मानें तो दिल दहसत से भर जा रहा है कि बेटी वाकई कहीं सुरक्षित नहीं है ,चाहे कोख हो,सड़क हो ,बस हो ,लिफ्ट हो ,ऑफिस हो या फिर अपने घर में हो। काल्पनिक बातों से परे यदि सोचे कि ऐसा कौन सी गलती उस बच्ची से हो गयी थी जिस कि कोई माफी नहीं थी। आज जिसे सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री कह कर साढ़े पाँच  साल से उछाला  जा रहा है ,उससे काफी कम उछाल बाप कि पगड़ी की हुई होती यदि सिर्फ एक माफ़ी आरुषि को मिल जाती। क्या तलवार बिना सोचे समझे आवेश ,उत्तेजना और क्रोध में अंधे हो ये नहीं देखता  कि कट क्या रहा है बेटी ,नौकर ,इज्जत या जिंदगी ?
  सुनते हैं तलवार दंपत्ति निःसंतान थे ,काफी सालों के बाद कृत्रिम तरीके से यानि आरुषि एक test  tube बेबी थी। कभी कभी इंसान ,ईश्वर के संकेतों को समझ नहीं पाता  है। शायद निःसंतान रहने का दुःख इस जहालत वाली जिंदगी से बहुत कम होता। 

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

सत्यता और ईमानदारी की प्रासंगिगता ख़तम हो गयी है



सत्यता और ईमानदारी की प्रासंगिगता ख़तम हो गयी है

बचपन से पढ़ते - सुनते आयें हैं कि व्यक्ति को हमेशा सत्य के  मार्ग पर चलनी चाहिए। चोरी ,बेईमानी ,दूसरो का दिल दुखाना बहुत गलत है। हमेशा सच बोलनी चाहिए ,किसी का दिल नहीं दुखानी  चाहिए और ईमानदारी से अपने कार्य करने चाहिए। जैसी करनी वैसी भरनी। अन्त में जीत सत्य और ईमानदारी  ही की  होती है। ………इत्यादि इत्यादि
 पर क्या वाकई ऐसा ही होता ??नहीं बिलकुल नहीं
एक सच्चा व्यक्ति यदि सत्य की  साथ देने की कोशिश भी करता है तो अकेला पड़ जाता है ,कोई उसकी बात को सुन ना भी पसंद नहीं करता है ,वही गोल मोल बाते करने वाले झूठों कि टोली बहुत बड़ी होती है। उसकी बात लोगो को प्रासंगिक लगती है। एक ईमानदार आदमी ताउम्र अपनी झोली को ईमानदारी की हवा से भरने कि कोशिश में पस्त रहता है वहीँ उसके चारो तरफ रहने वाले बेईमान की पर्स हमेशा मस्त ही रहती है और अपने आभा मंडल से ऐसे जगमग रहता है कि ईमानदार को अपनी ईमानदारी ले दुबक जाना होता है। होती होगी कभी सत्य की जीत ,रहती होगी कभी ईमानदारी भारी। आज तो एक ईमानदार व्यक्ति अकर्मण्य और बेवकूफ होता है।
ये किताबी बातें हैं सिर्फ कि किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए ,भावनाओं का कभी कोई मोल नहीं रहा है। यहाँ सैकड़ो उदाहरण है जब दिल पर पैर रख कर ही कोई ऊँचा उठा है।  दिल क्या होता ??मूर्खो की शब्दकोष का एक शब्द भर।
मुझे तो सबसे अधिक चिढ़ इस बात से होती कि हमें ऐसी भ्रामक बातें पढ़ाई /बताई ही क्यूँ गयी ?
बताया गया कि जैसी करनी वैसी भरनी -ईमानदार जलते रहा ,चिढ़ते रहा ,दुखी हो इन्तेजार करते रहा कि अरे !बेईमान तुम्हारी पोल एक दिन तो खुलेगी ……… पर अगला तरक्की पर तरक्की करता गया। ईमानदार सत्यवादी अंततः डरपोक ही साबित हुआ ,अंतिम हंसी की  इन्तेजार में क्यूँ कि ये गलत बात भी पढ़ाई  गयी थी कि अंतिम जीत हमेशा सच की ही होती है।
  बताया गया है हमेशा से कि झूठ नहीं बोलनी चाहिए ,झूठ के पैर नहीं होते। झूठ बोलना पाप है। पर वास्तविकता ये है कि धड़ल्ले से  लोग सच पर पर्दा डाले रखते हैं ,कौन कहता है पाप-वाप ,झूठ को तो पैरो की जरूरत ही नहीं है वोह तो आराम से पंख लगा उड़ते रहता है। सत्यवादी को अवसरवाद का ज्ञान ही नहीं होता है,बेकार जहां जो नहीं बोलनी चाहिए सच का सूरमा डाल बक आता है.
  ऐसे ही पुराने ज़माने में कई आलतू फालतू बातें बच्चो को सिखाई जाती थी कि चोरी करनी गलत बात है। "चोरी "भला ये क्या बला है? नकाब लगा काले चोर बीती समय का चरित्र है। जब चार लोग एक गलत को सही बोलने लगते हैं तो वह सच साबित हो जाता है ,उसी प्रकार जब लोग आराम से किसी  की संपत्ति हासिल कर सकतें है तो उसे होशियारी कहा  जायेगा न कि चोरी। जब सब यही कर रहें हैं तो फिर ये गलत कैसे हुई भला ?किसी चोर को पाप लगते देखा है ???कितनी शानो शौकत की जिंदगी ये जीतें हैं ,जो ये काम  न करतें हो वे  बस ललचाते -तरसते ,इसी इन्तेजार में दिन काटते हैं कि कभी तो चोरी का धन मोरी में जायेगा।

     सच !!!! अब नैतिक शिक्षा की कक्षा अब बंद कर देनी चाहिए। ……… जिस बात की प्रासंगिगता ख़तम हो गयी है उसे क्यूँ पढ़ाया /बताया जाये।








गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

तुम्हारा अहम् -स्वाभिमान और मेरा ???????अहंकार .

तुम्हारा अहम् -स्वाभिमान,

  और मेरा ???????अहंकार . 

 कम से कम  भावनाओं के स्तर  पर तो भेद भाव मत करो।

अहंकार और स्वाभिमान में फर्क होता है। अहंकार तो बहुत बुरा होता है,सर्वनाश की प्रथम सीढ़ी  होती है यह. इसका बीज भी मन,दिल या दिमाग में पनपना नहीं चाहिए।

पर स्वाभिमान खो कर व्यक्ति खुद की नजरों में भी गिर जाता है.विपरीत परिस्तिथियों  में भी यदि जरा सा भी स्वाभिमान बचा लिया  तो जीने का हौसला मिलते रहता है। अपने "स्व "का मान सवर्प्रथम खुद ही करना होगा। मैंने महसूस किया है की जब बिलकुल लक्ष्मण भाव से ,अपने स्व को किसी के लिए परित्याग किया है ,तो अगले का व्यवहार कुछ उग्र सा हो ,मुझे ही दबाने को तत्पर हो जाता है। मेरा झुकना/दबना अगले की खासियत बन जाती है।
 
परन्तु जब मैंने स्वाभिमान का एक तिनका रिश्तो के बीच रख लिया तो देखा कि अगले का "स्व" थोडा नरम रुख अपनाने लगा। सच !!!खुद को बिलकुल भी नहीं मिटा देना चाहिए - प्यार और रिश्तों के नाम पर। वरना दूसरों की छोड़ो ( उन्हें तो कभी खुश किया ही नहीं जा सकता है ) खुद की अंतरात्मा भी जीने नहीं देगी।

इस तरह से देखा जाये तो बहुत विनीत और Allways Ready To Help टाइप लोगों को लोग हलके तौर पर लेने लगते हैं।


मैं जब तुम्हारा चेहरा तकते रहती थी,
तब तुमने अपना चेहरा फेर रखा था।

       अब जब मैंने अपना चेहरा फेर रखा है,
        तब क्यूँ मेरा चेहरा तकते रहते हो। …





जिन्दगी भर मेरे एहसास को ,
क़दमों तले दबाए रखा।
आज जब मेरे एहसास को  ,
क़दमों के तल से आजादी मिली ,
तो गड़ने लगी न तलुए में ,
हकीकत की कंटीली राहें ??


हजारों तीर छोड़ें होंगे तुमने मेरी तरफ
सिर्फ एक का रूख घुमा दिए तो तिलमिला गए?

मैं तुम्हारी सबसे अपनी थी
घिस घिस कर खुद को
हीरा बना रही थी तुम्हारे लिए
तुमने मुझे भी पत्थरों के संग फेक दिया??


एक तरफा तो कुछ भी नहीं चलता।
मेरी अच्छाई को तुमने अपना
नसीब समझा।
अब जब मैं पीछे हट गयीं हूँ
क्यूँ कर  तुम्हारा नसीब बिगड़ा ??


हमेशा मैंने तुम्हे पुकारा ………
तुम्हारी इच्छा हुई तो तुम पलटे।
अन्यथा रुखाई और बेरुखी तुम्हारी
मेरी तो नसीब थी :( :(

क्या मेरी पुकार की तुम्हे
…… आदत भी न बनी ?
जो मैंने पुकारना छोड़ दिया ,
तो तुमने पलट कर हाल भी न पुछा।



मैं दबती रही तुम दबाते रहे
मैं रोती  रही तुम रुलाते रहे।
मन हुआ जो तेरा तो मुझको हंसा दिया ,
मन हुआ जो तेरा तो मुझको रुला दिया।

तुमसे बरसों बरस
    मैं
मन ही मन
लडती रहीं हूँ।
झूझती रहीं हूँ।
आज बरसो बरस
    बाद
ये महसूस हो रहा है
    कि
मैं तुमसी ही
होती जा रहीं हूँ.
    अब
क्या बरसो बरस
खुद से ही लड़तीं रहूँगी ??
























रविवार, 15 सितंबर 2013

माँ

तुम थी  ,मेरे लिए यही बहुत था।

तुम्हारी चारो तरफ ,घूमती मेरी जिन्दगी।

मेरी हर बात तुम से ही जुडी

मेरी हर सोच तुम तक  ही मुड़ी।

तुम खुश रहती  ,मैं हंस पड़ती।

किसी और से मुझे था मतलब कहाँ

केवल तुम से  आबाद था मेरा जहाँ 

जाने कैसे कब उम्र गुजर गयी ………

जाने कैसी बिमारियों में तुम  घिर गयी ।

भूल बैठी हो तुम  मुझे ,खुद को ,सब को

रखा है याद सिर्फ अपनी बचपन को।

निकल गएँ हैं हम सब जीवन से तेरे

मानों  सिर्फ मौसी -मामा है तेरे।

मम्मी हो तुम, मैं हूँ तेरी बिटिया ।

विस्मृति की घोर अँधेरी  छाया। ……

एक दिन टलेगी जब तुम जागोगी।

मुझसे हंसोगी तुम मुझसे बोलोगी।

मैं इन्तेजार इन्तेजार इन्तेजार करूंगी

तब तक ……………………

तुम हो ,मेरे लिए यही बहुत है।    


बुधवार, 28 अगस्त 2013

अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है।




अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।


यदि अचानक आपको पता चले की जीवन भर आप जिस से डरते आयें है। …। वो तो खुद मन ही मन आप से भय खाता  है तो कितना हल्का सा सारा जग लगने लगेगा। कितना फुस्स सा लगेगा की जिस के खौफ से रात दिन दिल चिंता ग्रस्त और मन भयभीत रहा हो उसकी तरफ से ऐसा संकेत आये की वोह भी दिल दिल आप से थोडा भय रखता है। मज़ा आ गया। ……

     पर  ये बदलाव ऐसे ही नहीं आया है ,………………. उसके लिए दिल को कितना कड़ा कर अपने स्वाभाव के विपरीत रूखा रूख अपना कर ,"जैसे के साथ तैसा" जैसा निति अपनाना पड़ा। जब तक  …यू कहें उम्र भर उनके आगे झुकते रहें ,डरते रहे, दबते रहें  …। वो झुकाते रहें और दबाते रहें। सही बात है सीधे खड़े पेड़ों पर आरी पहले  चलाई जाती है। दुष्ट प्रवित्ति के लोगो से ज्यादा विनीत हो कर व्यवहार करें तो वे इसे अपनी महत्ता समझने लगते हैं। हमारी अच्छाई को वे हमारी दीनता समझने लगतें हैं और अकड़ -अकड़ कर और धृष्ट होने लगते हैं।ये  कहने की बात है की अच्छाई से हर बुराई  को जीती जा सकती है या प्यार पत्थर को भी मोम बना देती है। …. हर बार ये फार्मूला सही नहीं होता है ,अब मेरा अनुभव कहता है की कभी कभी कुछ इतने खास जड़ लोग होते हैं जो सिर्फ अपनी ही बोली समझते हैं उनके सामने प्यार,संवेदना,समझदारी और विनय की भाषा दम तोड़ देती है। अगला यदि अदब और तमीज से बात कर रहा है तो लोग उसे अपनी क़ाबलियत समझ लेतें हैं। ऐसे ही लोग पत्थर चुनते चुनते हीरा गवां बैठते हैं। ऐसे लोगो से कुछ दिन अपने चोले को त्याग उनकी ही कमीज पहन आइना दिखा देना चाहिए। उन्हें अपनी अच्छाइयों की कमी महसूस करानी चाहिए। ……….
अति परिचय ते होत है ,अरुचि, अनादर भाय। मलयागिरि की भीलनी, चंदन देत जलाय 
 


गुरुवार, 22 अगस्त 2013

स्वप्न

उम्मीद से ज्यादा , वक़्त से पहले मिल जाए तो क्या अच्छा  हो 
सोचे  जो हो,चाहें   जो उससे अच्छा हो जाए तो क्या अच्छा  हो 
तरसने  तड़पने ललचने   से पूर्व निपट जाए तो क्या अच्छा  हो  
मन्नत  के पहले मांग स्वीकृत  हो जाये तो क्या अच्छा  हो। ....

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

हे बेटियों के पिता

हे बेटियों के पिता

बेटियों की किल्कारियों से है आंगन हरा भरा,
इनकी नन्ही शरारतों पर सबका मन रीझ रहा,
इनके इरादों के आगे हर अवरोध हारेगा,
मुश्किलें छोड़ कर राह करेंगी किनारा।

इनके हाथों मे जब जब किताबें होगीं,
ये आगे बढ कर कल्पना चावला बनेगीं,
इनके हाथों मे जब होगा टेनिस रैकेट,
बनेगीं सानिया मिर्ज़ा पार कर हर संकट।

इन्हे एक मौका देने मे ही है बस देर हुई,
कोई नहीं रोक सकता बनने से इन्द्रा नूई,
जिन्हे वोट देने का कभी अधिकार भी न था,
उन्होने आज लहरा दिया है हर क्षेत्र में झंडा।

वो दर्जी की बेटी देखो पुलिस अफ़सर हो गयी,
दूधवाले की बेटी कर रही है पी एच डी,
ठाकुर की बेटी भी तो करने जा रही एम बी ए,
इनके पांव को न बांध सक रही घर की दहलीज।

हे पिता इनको सहेजना जब पड़े मुश्किल घड़ी,
न डिगना कर्तव्य से याद कर उनकी कोई गलती,
कुछ भूल हो जाये तो भी मत छोडना इनका हाथ,
ये पत्थर नही इनमे भी है मज्जा और रक्त की धार।

बेड़ियां जो इज्ज़त के नाम से है इनके पांव में पड़ी,
पिता हो काट सकते हो यदि तुम करो हिम्मत थोड़ी,
बहुत बांध कर रख लिया इन्हे रिवाजों के बन्धन में,
दो मुक्ति अब ये भी उड़ें पंख पसार कर गगन में।

(this poem is not written by me )


सोमवार, 22 जुलाई 2013

लिव इन

पिछले दिनों चेन्नई रेलवे स्टेशन पर,रात के वक़्त  २-३ घंटे अपनी ट्रेन के इन्तेजार में बैठना पड़ा.वहां प्लेटफार्म पर  बहुत सी कुर्सियां लगी हुई हैं,जहाँ बैठ मैं अपना समय इधर उधर देखने में व्यतीत कर रही थी.तभी पास ही नीचे जमीन पर एक बुड्डी औरत बड़ी सी प्लास्टिक कुछ चीथड़े से कपडे वैगरह ले कर आई,उन्हें जमीन पर बिछा कर सोने का उपक्रम करने लगी.उसकी उम्र ८० से कम न होगी,वक़्त की मार चेहरे पर साफ़ झलक रहा था,पर कुछ तेज सा भी विद्यमान था,जो बरबस ध्यान खीच ले रहा था.अपने साजो सामान बिछा वह लेट गयी वहीँ.तभी एक और बहुत बुड्डे  सा   व्यक्ति जो उसी की तरह फटे पुराने कपड़ों में था लाठी टेकता आया,उसकी बगल में अपनी जगह बनाई और बैठ गया.दोनों आपस कुछ बतिया रहें थे.बुड्डे ने अपने झोले से कोई मलहम निकला और उसे बुदिया के तलवों में मलने लगा,अब मेरा भी ध्यान गया उसकी पैरों की तरफ गया शायद   कोई ग़हरा जख्म   था.
           पास ही  के कुर्सियों पर कालेज के कुछ लड़के-लड़कियों का ग्रुप बैठा था.वे लोग भी उन दोनों को ही देख रहे थे,कुछ हँसते हुए बतिया भी रहे थे.तभी एक ने जोर से कहा अरे ये देखो  बुड्डे-बुड्डी लिव इन रिलेशन में हैं........हे हे .......खुले आम इश्क फरमा रहें हैं.  सब जोरो से हंस पड़े.
         अचानक जो हुआ उसकी कल्पना न थी,बुड्डी महिला ब मुश्किल उठी,लंगड़ाते हुए उनके पास खड़ी  हुई और धाराप्रवाह अंग्रेजी में बोलने   लगी.सार यही था की.....
         यदि हम आज बुड्डे हैं तो कल तुम लोग भी होगे.यहीं पास के ओल्ड ऐज होम में हम रहते हैं,जहाँ आज अत्यधिक बरसात से पानी भर गया है,सो रात गुजरने प्लेटफार्म पर आ गए.बेटा मुझे पिछले ४ साल से मिलने नहीं आया है,मैं नहीं जानती वह ठीक भी है या नहीं.ये मेरा कुछ भी नहीं लगता पर हम सब यहाँ एक दुसरे का सहारा बने हुए  हैं.उम्र के इस चौथे पन में सारे रिश्ते  अपनी औकात पर आ गएँ है.हम आज बुड्डे और लाचार हो गएँ हैं तो  इसका ये मतलब नहीं की हमारा मजाक बनाया जाये................
   फिर दोनों ने धीरे अपना साजो-सामान समेटा और वहां से हट प्लेटफार्म के दुसरे छोर पर जा कर बैठ गए.कुर्सियों पर बैठे हुए सभी लोग जो अभी तक नज़ारे का मज़ा ले रहे थे, इधर-उधर देख झेप मिटाने लगे.

बुधवार, 10 जुलाई 2013

उतार- .चढ़ाव .....

सचमुच जीवन बहुत कठिन है.
बहुत कठिन है बहुत कठिन है.
याद नहीं सुख कब आया था
सुख भरे दिन हो गए स्वप्निल
सुख का सारा जीवन बीता....
दुःख ने छीन लिया  हर वो  पल
बिखर गया है सारा जीवन...
 पल पल दुखमय कण कण.
दौड़ रहें हैं भाग रहें है..
दिशाहीन हो भटक रहें हैं.
सचमुच जीवन बहुत कठिन है.
बहुत कठिन है बहुत कठिन है.

प्यार भरा था सारे रिश्ते
अपनापन में रिश्ते  नाते
मन जीवन सब महक रहा था
प्रेम सुगंधी से दिल चहक रहा था.
रोग बीमारी दूर पड़ी थी.
कदम  सफलता चूम रही थी.
कार्य क्षेत्र भी बड़ा सरस था.
बिगड़े काम सवंर ही जाते.
दुःख-विपत्ति टलते जाते.
ऐसा जीवन बीत गया सब.
स्वप्न लोक सा मेरा जीवन
कहाँ गया आलोकित वो मन.

अब तो  जीवन बहुत कठिन है.
बहुत कठिन है बहुत कठिन है.
खट्टे हो गए रिश्ते नाते......
अपने को अब हम न भाते.
उनकी ही तो हाय ! पड़ी है..
रूठ रूठ कर लड़ी पड़ी है..
नए जगह में नए लोग हैं
कार्य क्षेत्र में पूछ नहीं है
अपना कोई हीत नहीं है
हीत नहीं है मीत नहीं है.
सूनापन है खालीपन है.
बेचारगी आवारापन है.
रोग-बीमारी अक्सर  रहते
थक गए अब सहते सहते.
बनता काम बिगड़ ही जाता
सफल सफलता दूर है जाता.
यूं ही जीवन बीत रही है...
सुखमय जीवन रीत रही  है.


सचमुच जीवन बहुत कठिन है.
बहुत कठिन है बहुत कठिन है.
गलती हो तो माफ़ करो जी... 
जीवन दिल को साफ़ करो भी.
टूटे रिश्ते फिर से जोड़ो.....
जोड़ो ऐसा पक्का नाता
प्यारभरा जीवन पथ गाथा.
सुफल  सफलता घर भी आओ
हम को अब तुम छोड़ न जाओ.
सुख मेरे तुम वापस आओ.
दुख  को सारे तुम दूर भागो.
प्रेम मुहब्बत बसने आओ
रोग बीमारी जल्दी भागो.
किस्मत जीवन सरस बना दो
सुखद बना दो सफल बना दो.








  

बुधवार, 3 जुलाई 2013

ऊब

ऊब 

तुम  रूठे रहते हो,मैं मनाती  रहती हूँ.
मैं मनाती हूँ,तुम फिर रूठ जाते हो.
बार बार रूठने की आदत अब छोड़ दो.
रिश्तो को ख़ूबसूरत अंजाम पर मोड़ दो.
....कहीं ऐसी कभी कोई बात हो जायेगी
मुझे तुम्हारे रूठने की आदत हो जायेगी.
नाराजगी  झेलने की ताकत आ जाएगी.
तुम रूठे रूठे इन्तेजार करते रह जाओगे,
 रूठा -रूठी से ऊब मैं कहीं और बढ जाउंगी.

मंगलवार, 28 मई 2013

यादों का हरश्रींगार झड़े


यादों का हरश्रींगार झड़े



यादों का हरश्रींगार झड़े झड़-झड़.....   
उम्र गुजरती जाये,मन पीछे गोता खाये।
आंखो के आगे बचपन लौट लौट सी आए।
नानी का घर सपन खिलौने अपने लगते
दादा दादी मामा मामी याद आ गए सारे रिश्ते
रिश्ते-नाते गर्मी छुट्टी आम बगीचा
कूद-फांद और धमा चौकड़ी सारे बच्चे

यादों का हरश्रींगार झड़े झड़-झड़....।
गुड्डे गुड़िया खेल खिलौने पदना लिखना
संग सहेली गाने गाना  हँसना  रोना
चुगली-शुगली शोर मचाना  हल्ला गुल्ला
लड़ना झगड़ना रूठा रूठी हाथ मिलाना।

यादों का हरश्रींगार झड़े झड़-झड़....।
चाचा जी की चिट्ठी आयी,डाक्टर बन कर नाम कमाओ
इस महान पेशा को अपनाना है
बस डाक्टर ही तुम को बनना है।
अब तो केवल बहुत पढ़ाई ,खूब पढ़ाई
 कुछ बनना है काम तो मुझको  करना है।

. यादों का हरश्रींगार झड़े झड़-झड़....।
कंधे मेरे दुखते हैं,बोझ है तू उतर भी जा.. ।
माँ मुझको पढ़ने दो न,थोड़ा सा कुछ बनने दो न।
शादी करके पढ़ती रहना,काम तू अपनी करती रहना।
शादी करले मैं पढ़ाऊँगी,मेरा तुझसे पक्का वादा।
  
यादों का हरश्रींगार झड़े झड़-झड़....।
वादा टूटा वादा झूठा, मेरा खुद का सपना टूटा।
घर गृहस्थी नून तेल लकड़ी,पिसती रह गयी ,
वक़्त है गुजरा,समय है बदला,बुड्डी हो गयी
टूटे सपने जोड़ न पायी,आगे मै फिर पढ़ न पायी।
 यादों का हरश्रींगार झड़े झड़-झड़....।  .

.
    


शुक्रवार, 3 मई 2013

दिल

मेडिकल साइन्स बताता है मानव दिल मे चार खाने होते हैं,पर क्या एक औरत के दिल मे बस चार ही कमरे होते हैं?बड़ा ही पेचीदा बनावट होता एक औरत का दिल.इसमे अनगिनत तो छुपे तहखाने होते  है,खानो के अंदर कई खाने और उनपर कई कई मोटे पर्दे पड़े होते हैं.जाने कितने सारे राज इन कमरो  के दीवारों के पीछे कैद होंगे,जाने कितनी जीवंत इक्षाएं,सपने और कल्पना मोटे-मोटे पर्दो के पीछे बैठी आज भी आहें भर रहीं होंगी.औरत के दिल मे इतने सारे परत दर परत तले एक ऐसा अंग सुरक्षित पलता रहता है जिस का चित्र आज तक मेडिकल साइन्स नहीं जारी कर पाया है,वो है "मन".हृदय के किस कोने यह अंग पलता रहता है,किसी को नहीं मालूम.मन जिस का आकार-प्रकार तो पता नहीं पर नाजुक जरूर होता है.औरत हज़ार परतो के भीतर इसे छुपा कर,ज़िंदगी के  हर उतार-चड़ाव मे इसे दबाए  जीती रहती है.कभी रात के सन्नाटे मे,अकेले भोर मे दिल की  कहीं कोई तुरपन खुल जाती है और फिर मन उसी रास्ते रिसने लगता है...... कोई कांटा कभी दिल मे चुभा था....सारी रात मन को चुभती रहती है.रिसती जाती है.....चेहरा भिगोती जाती है....

गुरुवार, 2 मई 2013

लक्षमिन

लक्षमिन 

सात-आठ महीने पहले मेरे पति की पोस्टिंग छत्तीसगढ़ के अंदरूनी इलाके मे हो गयी है.खूब बड़े बड़े विभिन्न प्रजाति के पेड़ पौधों के बीच मैं अपना मन लगाने की कोशिश करती रहती हूँ.धीरे घरो मे काम करने वाली बाईयों के जरिये यहाँ के लोगो रहन सहन इत्यादि से भी परिचय हो रहा है.महिलायें बहुत मेहनती और शारीरिक रूप से मजबूत दिखती हैं.मर्द वैसे ही सारे जहाँ  की तरह बेदर्द.....आलसी और शराबखोर.बहु-विवाह औरत-मर्द दोनों मे प्रचलित है.बहुत आराम से साथी बदलतीं हैं महिलायें.मेरे घर एक प्यारी सी तीखे नाक-नक्श वाली लड़की काम करने आती है,लक्षमिन.उसका एक पाँच साल का बेटा भी है,उसकी कमनीयता देख लगता नहीं है की वो इतने बड़े बच्चे की माँ होगी.कलाइयाँ चूड़ियों से और मांग सिंदूर से भरी हुई.खुशमिजाज और ईमानदार.धीरे धीरे मुझे पता चला वो छोड़ी हुई औरत है,मैंने इसका मतलब पूछा पता चला पति ने दूसरी कर ली है,सो बेटे को ले अलग रहती है.अपना कमाती है.मेरे घर एक बुड्डा सा माली कम करने आता था,लक्षमीन ने बताया की एक दिन वह उसका पीछा करते हुए उसके घर पहुँच गया था.....अपने कुछ भद्दे प्रस्ताव के साथ.मैं सिहर गयी,पर उसे ऐसे  लोगो से निपटना आता था.उसने बताया की दीदी इसी लिए मैं सिंदूर-चूड़ी धारण की रहती हूँ ताकि लोग मुझे  एकाकी औरत न समझे.कभी बोलती दीदी रात कितनी लंबी होती है....कभी अपने मोबाइल पर आए अंग्रेजी मे आए एसएमएस पदने बोलती,मैं पदती आई लव यू ,किसने भेजा लक्षमीन?वह शरमा जाती. जाहिर था उसका मन,शरीर और दिमाग भटक रहा था...।
पति बड़े घर और जमीन का मालिक था.उस पर उसके जमीन के नीचे कोयला होने के कारण मुआवजा  भी भरपूर मिला था.आए दिन लक्षमिन छुट्टी लेती रहती तब पता चला की उसने पति पर केस ठोक रखा था,दूसरी शादी करने पर.जज को उस से पूरी हमदर्दी  थीऔर बिना वकील अपना केस लड़ने की उसे इजाजत थी.
नयी नयी तारीख पड़ती रहती....उसका पति को अदालत का चक्कर बेवजह लगने लगा,उसपेर हरजाना  देने की दबाव बदने लगा तो उसके व्यवहार मे बदलाव आने लगे.लक्षमिन बता रही थी की एक लड़का है.....जो उसे बहुत प्यार करता है.दिन भर वह काम छोड़ छोड़ उस से बातें करती.शायद  घर पर भी आता था उसके.वह बताती की बहुत से और लोग उस से रिश्ते को को तैयार हैं.पर अधिकतर शादीशुदा है.वह बताती की यदि वह किसी और से शादी करेगी,या उसके घर मे बैठेगी , तो बेटा को उसके पिता के पास ही हमेशा के लिए चले जाना होगा..बेटे को साथ रखने की लालच मे वह दूसरी शादी को ले ऊहा- पोह वाली स्थिति से गुजर रही थी.उसका पति भी फिर से डोरे डालना शुरू कर दिया .बेचारी लक्षमिन अपने दिल से कई स्तरों पर लड़ रही थी।
  इसी बीच एक घटना घट गयी.उसकी सहेली गीता जो दो बच्चो की माँ थी,बेटी तो कुछ 11-12 साल की थी,किसी दूसरे के साथ गायब हो गयी.वह भी छोड़ी हुई थी पर लक्षमिन की तुलना मे ज्यादा छमक-छल्लो थी.हर दिन किसी बाइक के पीछे बैठी दिखती थी.साज-सज्जा भी भड़कीला .हाँ तो गायब हो गयी,नियम अनुसार उसके बच्चो का पिता अपने दोनों बच्चो को ले कर चला गया क्यूँ कि उस तक खबर पहुँच ही चुकी थी.3-4 महीने के बाद मरियल सी गीता लक्षमिन  के साथ  दरवाजे पर खड़ी थी.भवरा रस पी उड़ चुका था. लगाया काम छूट चुका था.बच्चे जिनहे छोड़ वह अपने सुख कि खातिर भागी थी देख कर मुह मोड लिया था.कमजोर आकर्षण- विहीन गीता कि बेबसी पर द्या आ गयी.लूटी-पिटी सी मुह लटकाई बेचारी.ज़िंदगी के सिरे को डुंडती।
  लक्षमिन ने उसे अपने घर मे सहारा दे रखा था.अब वह फिर से विचार करने लगी अपने जीवन के फैसले पर.नए नए छोकरो से अब बचने लगी,गीता का हश्र  देख चुकी थी.एक दिन बता  रही थी कि उसे अपना पति कभी पसंद नहीं था ,पर दीदी एक दिन उसने मुझे मंदिर का प्रसाद खिलाया उसके बाद वह मुझे भाने laga. जरूर कुछ जादू-मंत्र कर दिया था उस मे.मुझे बरसो पहले पदी हुई "जंगली बूटी" कहानी  याद आ गयी.भोली लक्षमिन ने केस वापस ले लिया ,हरजाने के तौर पर उसका पति कुछ रुरुपये दे दिये.उसका पति कानूनी तौर पर तलाक ले लेने के लिए दबाव बना रहा था.पर अब वो तलाक नहीं लेना चाहती थी.वही....पुराना  फंडा "भला है बुरा है जैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है " बेचारी जो अपने बच्चे के चलते शादी नहीं करना चाहती थी अब उसे उसके पिता के पास भेजने लगी.बोलती,दीदी मैं तो गरीब हूँ ,अपने बच्चे को सब सुख नहीं दे पाऊँगी .अपने बाप के पास आता जाता रहेगा तो हिल मिल जाएगा.मै कभी दूसरा मर्द नहीं करूंगी.....नहीं तो गीता की तरह मेरा बेटा भी मुझसे दूर हो जाएगा............।
  माँ किसी प्रांत मे हो,शहर या जंगल में हो.......दिल वही रहता है।

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

लघु कथा - - 1 कृतघ्न,एहसास,सुनी -सुनाई ,बदला -चित्र कथा

एहसास

   
    शुक्ला जी अपने समय में बहुत चुस्त और फुर्तीले हुआ करते थे.किसी भी तरह का कोई अटका काम हो ,लटका काम हो.....वे बड़ी चतुराई से निकाल लिया करते थे.अपना काम तो बड़ी होशियारी से करते ही थे,बच्चो के बड़े होने पर उनकी गृहस्थी के उलझनों को भी सुलझाते रहते थे.ऐसे बहुतेरे मौके आते थे जब उनके बच्चो के काम अटक जाते थे कभी बैंक मे तो कभी पोस्ट ऑफिस मे.कभी किसी सरकारी दफ्तर मे तो कभी घर-जमीनी काम.सभी उलझनों को बड़े मनोयोग से सुलझाते.उनके बच्चे उनके कायल थे.धीरे धीरे उन्हे लगने लगा कि बहुत दिनो से किसी बच्चे का कोई मामला उन्हे अटका-लटका नहीं दिख रहा है,उत्सुकता वश वे खोद खोद उनसे पूछते रहते कि कोई काम तो नहीं...।
तभी बातचीत के दौरान पता चला बेटे कि किसी क्रेडिट कार्ड कंपनी से कुछ गलत बिलिंग का लफड़ा चल रहा है,उन्हे लगा अब तो मुझे बताएगा ही बेटा,मेरे बिना कैसे सुलझेगा ये मामला.कुछ दिन गुजर गए तो खुद बेटे से पूछा बताओ मामला क्या है....डीटेल दो...तुम से ये सब होने -जाने वाला नहीं,मुझे करने दो.बेटे ने कहा हो जाएगा पापा,होते रहता है ये सब.हूँ .....करो मालूम तो है नहीं कैसे करना है.....फिर मुझे मत कहना.बेचैनी बदती जा रही थी.....मेरे बिना...मेरे बिना.....घर के काम मेरे बिना ...कैसे हो सकता है...फिर एक दिन बेटे ने सूचना दी पापा क्रेडिट कार्ड वालों ने अपनी गलती मान ली,मामला सुलझ गया.शुक्ला जी पता नहीं खुश नहीं हो पाये,मेरे बिना ,ये बात चुभ रही थी.......।
सच मुच मैं बुड्डा हो गया...।
सच बुड्डे होने का एहसास मनोबल तोड़ देता है.






कृतघ्न


कृतघ्न
"माँ तुम इतनी देर कहाँ रह गयी थी ?देखो पापा इतनी देर से गों गों क्या कह रहें है,शायद उन्हें टॉयलेट जाना था और अब तो पायजामा भी गीली कर दी है।"
" मारे बदबू के नाक फटा जा रहा है और तुमने कौन वाली दवाई देने कहा था मैं भूल ही गया। जल्दी से रसोई में जाओ बेचारी रीमा अकेली परेशान हो रही है इतने लोगो के खाना बनाने में।"
माँ क्या बताती कि अत्यधिक थकान,मशक्कत और उम्र के तकाजा के कारण मंदिर में बेहोश हो गिर गयी थी ,वरना २०-२५ दिन पहले लकवा ग्रस्त पति को वह खुद अनजानों के बीच नहीं छोड़ती जिन्हे समझ न आ रहा हो कि बीमार पिता क्या बोल रहें हैं।
वह एकटक देखती रह गयी कि उसका बेटा यूं ही कैसे २९ वर्ष का हो गया।






सुनी -सुनाई 
आज मैं "दुल्हन "नामक एक श्रृंगार स्टोर में चूड़ी -बिंदी इत्यादि खरीदने गयी। सेल्स गर्ल दिखाने लगी ,वहीँ दुकान की मालकिन जो काउंटर बैठी किसी दूसरी महिला से ऊँचे स्वर में अपनी बहू की शिकायत कर रही थी- मैंने तो साफ कह रखा है कि मायके वालों से कोई सम्बन्ध न रखो ,जब तक तुम्हारे घरवाले तयशुदा रकम की अदायगी न कर दें। तब दूसरी ने कहा कि यदि दहेज़ केस में फंसा दिया तो ?तो दुकानवाली ने कहा कि मैंने घर के सारे चार्जिंग पॉइंट बिगाड़ दिए हैं ताकि वह मोबाइल चार्ज न कर सके और किसी से बाते नहीं कर सके। रोज दिन दुकान आते वक़्त उसे रसोई में ताले में बंद कर आती हूँ ,उसके बाप की सारी हेकड़ी निकाल दूंगी मुझसे मक्कारी करेगा। ..........
मुझसे अब और बर्दास्त नहीं हुआ मैं दुल्हन श्रृंगार स्टोर से बिना कुछ लिए निकल गयी। — feeling bad.






बदला -चित्र कथा
ये कहानी बहुत पुरानी है। ऐन फेरों के पहले शादी के मंडप से सैकड़ो लोगो के बीच से रणजीत ने पारिवारिक पुरानी रंजिश का बदला लिया था। दुल्हन बनी बानी को उठा कर उसे अपनी पुरानी हवेली के कमरे के पलंग पर पटकते हुए कहा कि वह जल्द ही अपनी जीत का जश्न मनाने का इंतेजाम कर आता है ,फिर सोचेंगे कि बानी के साथ क्या करना है। बन्दूक से गोली दागता वह ख़ुशी से झूम रहा था कि उसने अपने पुरखो के अपमान का बदला ले लिया .बानी पलंग पर बैठे अपने किस्मत को कोस रही थी कि क्या से क्या हो गया। तभी एक बूढ़ा सा व्यक्ति पलंग के पास आया ,बानी डर से सिमट गयी। उसने कहा,डरो मत मैं रणजीत का दादा हूँ ,मैं माफ़ी चाहता हूँ कि मेरे पोते ने ऐसा किया। तुम ये लिफाफा पकड़ो इनमे कुछ रुपयें हैं जो तुम्हारे काम आयेंगे और जल्दी से अपने घर लौट जाओ। मैं नहीं चाहता हूँ कि ये कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी दुहराई जायी। मेरी बेटी तो हमेशा के लिए चली गयी पर मैं नहीं चाहूंगा हूँ कि दुश्मन को भी ऐसी पीड़ा से गुजरनी पड़े।

बदला  -चित्र कथा 
ये कहानी बहुत पुरानी है। ऐन फेरों के पहले शादी के मंडप से सैकड़ो लोगो के बीच से रणजीत ने  पारिवारिक  पुरानी रंजिश  का  बदला लिया था। दुल्हन बनी  बानी  को  उठा  कर उसे  अपनी पुरानी हवेली  के कमरे के  पलंग पर पटकते हुए  कहा कि  वह  जल्द  ही अपनी जीत का जश्न मनाने का इंतेजाम कर आता है ,फिर  सोचेंगे कि  बानी के साथ क्या करना  है। बन्दूक से गोली दागता वह ख़ुशी  से झूम  रहा था कि  उसने अपने पुरखो  के अपमान  का बदला  ले  लिया ,जब  उसके घर की कोई बेटी बानी के घर के किसी लड़के साथ गायब हो गयी थी। बानी पलंग पर बैठे अपने किस्मत को कोस रही थी कि क्या से क्या हो गया। तभी एक बूढ़ा सा व्यक्ति पलंग के पास आया ,बानी डर से सिमट गयी। उसने कहा,डरो मत मैं रणजीत का दादा हूँ ,मैं माफ़ी चाहता हूँ कि मेरे पोते ने ऐसा किया। तुम ये लिफाफा पकड़ो इनमे कुछ रुपयें हैं जो तुम्हारे काम आयेंगे और जल्दी से अपने घर लौट जाओ। मैं नहीं चाहता हूँ कि ये कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी दुहराई जायी। मेरी बेटी तो हमेशा के लिए चली  गयी पर मैं नहीं  चाहूंगा हूँ कि दुश्मन को भी ऐसी  पीड़ा  से गुजरनी पड़े।








कोयला खदान 


छत्तीसगढ़ की धरती बड़ी ही समृद्ध है। एक तरफ तो घने जंगलों की सघनता तो दूसरी तरफ गर्भ में काला हीरा कोयले की प्रचुरता। पारो अपने पति और कुछ अन्य लोगो के साथ बांसवाड़ा ,राजस्थान से कोरबा  काम करने कुछ ३-४ साल पहले आयी थी। पहले वह भी काम करती थी पर एक बच्चा हो जाने के बाद वह मजदूरी छोड़ घर सँभालने लगी। अक्सर मन नहीं लगने पर वह बच्चे को गोदी में ले कर खदान में आ जाती और एक तरफ ढेरी पर बैठ काम करती औरतों से बतियाती। खदान में कोयले की निकासी के चलते काली धूल उड़ती रहती ,बड़े बड़े डोजर डम्फर चलते तो नीला आसमान काला हो जाता। धरती के अत्यधिक दोहन से पर्यावरण की सारी व्य़ाख्या यहाँ दम तोड़े रहती है। आज पारो पूरी सज धज के साथ आयी थी ,गले में सोने की पानी चढ़ी माला ,पैरो में पायल ,नयी लाल चूड़ियाँ ,गहरे बैगनी लहगा और होठों पर लाली भी थी। सोचा था पति काम कर ख़तम कर ले तो कोरबा सिनेमा देखने जाउंगी। कोई पेड़ -छावं तो था नहीं गमछी से ही छाया कर रही थी तभी खदान में दूर कहीं ब्लास्टिंग कर कोयला तोडा गया और धूल की आंधी ऐसी चली कि लगा पारो का काजल सर्वस्य फैल गया। उसने मोबाइल से अपने पति को रिंग किया , तभी उसने जो देखा वह खदान की आम घटना थी, उसका पति एक विशालकाय डम्फर के भीमकाय चक्कों तले पिस कर पापड़ हो चुका था। धूल इतनी घनेरी थी कि पास आ गयी डम्फर उसे दिखाई नहीं दिया और ब्लास्टिंग के शोर में सुनाई भी नहीं दिया। बस एक हाथ बाहर था और  मुठ्ठी में मोबाइल बजे जा रहा था 























कोयला खदान 

बेटी की विदाई- एक व्यंग्य

                           





लड़की की बस अभी विदाई  हुई ही थी,लड़की की माँ दहाड़े  मार,रो रो कर आसमान-पाताल एक करने लगी.वहाँ उपस्थित सभी की आखें नम होने लगी.रोते हुए वे उच्च स्वर मे क्रंदन करते हुए बेटी के जाने का गम का भी बखान कर रहीं थी.सुबह उठते अब मुझे और इनको चाय का प्याला कौन पकड़ाएगा ...... मेरी पूजा की थाली कौन सजायेगा,कौन अपने बाबू जी को कपड़े इस्तरी कर देगा......ऊं ऊँ.....कौन मेरी  नाश्ते की प्लेट सामने रखेगा....अब कैसे मेरी गृहस्थी  चलेगी रे !मुन्निया तेरे बिना????कौन छोटे भाई को स्कूल के लिए तैयार करेगा,अररे कौन खोलेगा रे मुन्निया दिन भर घर का दरवाजा.छाती पीटते हुए माँ बेटी के बियोग मे कह रहीं थी कैसे बनेगी अब रसोई ,कौन गमलों को पानी देगा,साफ सफाई घर कि कैसे होगी  ....... .हीरा सी बेटी मेरी चली गयी अब रात मे कौन हमारे पैर दबाएगा.....…

    स्वर शनै शनै बढ़ रहा था.......मैं सोचने को मजबूर हो गयी कि यदि हजार दो हजार मे एक महरी रख दी जाये तो शायद बेटी  की विदाई का  गम नहीं सालेगा। 

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

महिला दिवस . विसर्जन

 महिला-दिवस





नौसेना दिवस,मजदूर दिवस,पृथ्वी दिवस,विकलांग दिवस इत्यादि वर्ष भर विभिन्न प्रकार के दिवस मनाए  जाते हैं,ताकि इस विशेष दिवस पर उसकी खूब चर्चा हो,उसके हित के लिए काम हो सके.सत्तर के दशक में महिला दिवस भी कुछ ऐसी ही सोच  के साथ शुरू हुई थी,जब महिलाओं को अलग  प्रजाति का दर्जा प्राप्त था.इतने सालो मे लोगो के सोच मे बदलाव तो आया है.महिलायें भी शिक्षित हो पुरुषो की बराबरी आ खड़ी हुई हैं.अब अंतर शिक्षित -अशिक्षित ,दबंग-कमजोर का रह गया है.आप ऐसा बहुत घर जानती  होगीं जहां पुरुष ही दबबू और शोषित नजर आते हैं.हाँ,एक बात ऐसी है जहां हम मारीं जाती हैं वो है बलात्कार जैसी घटनाएँ.ये तो इंसान की पैशाचिक भावनाएं है,हर पुरुष जानवर नहीं होता है.जब मनुष्य के अंदर का जानवर प्रबल हो उठता है,मनुष्यता दफन हो जाती है,एक कुत्ते  की तरह सिर्फ मादा और नर बाकी रह जाता है....तब ऐसी घिनौनी हरकत कर बैठते हैं मानसिक रूप से विकृत व्यक्ति।
    अत:अभी भी महिला दिवस मनाना खुद को ही विशेष  दर्ज़ा का समझना होगा,नहीं तो पुरुष दिवस भी मनाया जाय . खुद को साबित करना क्या अभी बाकी है???    

         आज के दिन को "पुरुष सदबुद्दि"दिवस के रूप मे अब मानना चाहिए.महिलायें तो ठीक रास्ते पर चल ही रहीं हैं.पुरुषो की विवेकहीनता ही से अधिक परेशानी है      

**************************************************************************88
विसर्जन

आज दिन भर महिला दिवस की धूम रही। पहले कॉलेज की सभी महिला प्राध्यापकों को सम्मानित किया गया। बड़े बड़े भाषण और कशीदे काढ़े गए। फिर टाउन हॉल में शहर की प्रबुद्ध महिलाओं की एक बैठक हुई। अपने क्षेत्र की कुछ सफल औरतों को पुरस्कृत किया गया। 'हैप्पी विमेंस डे' का मैसज दिन भर फॉरवर्ड होता रहा। जब सविता दोपहर बाद घर पहुंचीं तो देखा पिछले मज़दूर दिवस पर कॉलोनी वाले जिसे गुलदस्ता और शाल ओढ़ा कर सम्मानित किया था ,आज उसके बगीचे की सफाई में लगा हुआ था। कार से गुलदस्तों ,शाल,उपहारों से लदी- फदी उतर सविता ने बैठक में पैर रखा ही था तो देखा भृकुटी चढ़ाये सास-ससुर जी बैठे हुएं हैं। 
 अरे ! पिता जी आप कब आएं ?
"कहता था मैं नौकरी वाली औरत से शादी मत करों। अब भुगतो" ससुर जी गरजें। 
पतिदेव अपराधबोध से ग्रस्त किंकर्तव्यविमूढ़ हो  बोलें ,"जल्दी से खाने का इन्तेजाम करों इनका"
सविता दौड़ पड़ी रसोई की तरफ ,तेजी से उसने गुलदस्ता फेंका तो हिंदी दिवस पर ली गयी एक पुस्तक को गिराते हुए वह कोने में लुढक गयी। 
मम्मी जी  ने अब बड़बड़ाना चालू कर दिया था। 
देवी पूजन के बाद विसर्जन की प्रक्रिया भी तो होती ही है .......