शुक्रवार, 8 मार्च 2013

महिला दिवस . विसर्जन

 महिला-दिवस





नौसेना दिवस,मजदूर दिवस,पृथ्वी दिवस,विकलांग दिवस इत्यादि वर्ष भर विभिन्न प्रकार के दिवस मनाए  जाते हैं,ताकि इस विशेष दिवस पर उसकी खूब चर्चा हो,उसके हित के लिए काम हो सके.सत्तर के दशक में महिला दिवस भी कुछ ऐसी ही सोच  के साथ शुरू हुई थी,जब महिलाओं को अलग  प्रजाति का दर्जा प्राप्त था.इतने सालो मे लोगो के सोच मे बदलाव तो आया है.महिलायें भी शिक्षित हो पुरुषो की बराबरी आ खड़ी हुई हैं.अब अंतर शिक्षित -अशिक्षित ,दबंग-कमजोर का रह गया है.आप ऐसा बहुत घर जानती  होगीं जहां पुरुष ही दबबू और शोषित नजर आते हैं.हाँ,एक बात ऐसी है जहां हम मारीं जाती हैं वो है बलात्कार जैसी घटनाएँ.ये तो इंसान की पैशाचिक भावनाएं है,हर पुरुष जानवर नहीं होता है.जब मनुष्य के अंदर का जानवर प्रबल हो उठता है,मनुष्यता दफन हो जाती है,एक कुत्ते  की तरह सिर्फ मादा और नर बाकी रह जाता है....तब ऐसी घिनौनी हरकत कर बैठते हैं मानसिक रूप से विकृत व्यक्ति।
    अत:अभी भी महिला दिवस मनाना खुद को ही विशेष  दर्ज़ा का समझना होगा,नहीं तो पुरुष दिवस भी मनाया जाय . खुद को साबित करना क्या अभी बाकी है???    

         आज के दिन को "पुरुष सदबुद्दि"दिवस के रूप मे अब मानना चाहिए.महिलायें तो ठीक रास्ते पर चल ही रहीं हैं.पुरुषो की विवेकहीनता ही से अधिक परेशानी है      

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विसर्जन

आज दिन भर महिला दिवस की धूम रही। पहले कॉलेज की सभी महिला प्राध्यापकों को सम्मानित किया गया। बड़े बड़े भाषण और कशीदे काढ़े गए। फिर टाउन हॉल में शहर की प्रबुद्ध महिलाओं की एक बैठक हुई। अपने क्षेत्र की कुछ सफल औरतों को पुरस्कृत किया गया। 'हैप्पी विमेंस डे' का मैसज दिन भर फॉरवर्ड होता रहा। जब सविता दोपहर बाद घर पहुंचीं तो देखा पिछले मज़दूर दिवस पर कॉलोनी वाले जिसे गुलदस्ता और शाल ओढ़ा कर सम्मानित किया था ,आज उसके बगीचे की सफाई में लगा हुआ था। कार से गुलदस्तों ,शाल,उपहारों से लदी- फदी उतर सविता ने बैठक में पैर रखा ही था तो देखा भृकुटी चढ़ाये सास-ससुर जी बैठे हुएं हैं। 
 अरे ! पिता जी आप कब आएं ?
"कहता था मैं नौकरी वाली औरत से शादी मत करों। अब भुगतो" ससुर जी गरजें। 
पतिदेव अपराधबोध से ग्रस्त किंकर्तव्यविमूढ़ हो  बोलें ,"जल्दी से खाने का इन्तेजाम करों इनका"
सविता दौड़ पड़ी रसोई की तरफ ,तेजी से उसने गुलदस्ता फेंका तो हिंदी दिवस पर ली गयी एक पुस्तक को गिराते हुए वह कोने में लुढक गयी। 
मम्मी जी  ने अब बड़बड़ाना चालू कर दिया था। 
देवी पूजन के बाद विसर्जन की प्रक्रिया भी तो होती ही है .......