मंगलवार, 23 सितंबर 2014

स्वच्छ देश-एक सपना एक अभियान

स्वच्छ देश-एक सपना एक अभियान   1
सिर्फ अपने तन और घर की सफाई ही नहीं हमे अपने आसपास की साफ सफाई पर भी ध्यान देना होगा य़दि देश का हर व्यक्ति इसके प्रति जागरूक हो जायेगा तो देश चमक उठेगा। छोटी छोटी  बातों का हम ध्यान दे जैसे रास्ते में चलते हुए हम चिप्स, आइसक्रीम या कोई अन्य रैपर बेख्याली में उड़ा देते हैं। दो तीन दिन उसे बाहर कहीं भी ना फ़ेंक अपने बैग में डालते जाएँ आप महसूूस करेंगे कि कितना कूड़ा बैग में जमा हो गया  है। सो ,प्रण ले कि आज से रास्ते में कहीं भी हम किसी भी प्रकार का कचरा नहीं फेंकेंगे। उसे सच में अपने पास बैग में तब तक रखेंगे जब तक उसे फेंकने हेतु  नियत -उचित स्थान ना मिल जाए। 
 आइये स्वछता  को अपनी आदत में शुमार करें।  

सोमवार, 15 सितंबर 2014

शरतचन्द्र की सशक्त स्त्री पात्र

शरतचन्द्र की सशक्त स्त्री पात्र
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय (१५ सितंबर, १८७६ - १६ जनवरी, १९३८ ) बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे।शरत्चंद्र ने अनेक उपन्यास लिखे जिनमें पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल, मेज दीदी, दर्पचूर्ण, श्रीकांत, अरक्षणीया, निष्कृति, मामलार फल, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास, बाम्हन की लड़की, विप्रदास, देना पावना आदि प्रमुख हैं। बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर "पथेर दावी" उपन्यास लिखा गया। कहा जाता है कि उनके पुरुष पात्रों से उनकी नायिकाएँ अधिक बलिष्ठ हैं। शरत्चंद्र की जनप्रियता उनकी कलात्मक रचना और नपे तुले शब्दों या जीवन से ओतप्रोत घटनावलियों के कारण नहीं है बल्कि उनके उपन्यासों में नारी जिस प्रकार परंपरागत बंधनों से छटपटाती दृष्टिगोचर होती है, जिस प्रकार पुरुष और स्त्री के संबंधों को एक नए आधार पर स्थापित करने के लिए पक्ष प्रस्तुत किया गया है, उसी से शरत् को जनप्रियता मिली। उनकी रचना हृदय को बहुत अधिक स्पर्श करती है।आमतौर पर हारा हुआ नायक और मजबूत स्त्री पात्र उनकी कहानियों का आधार हुआ करते थे। शरतचन्द्र की ‘देवदास’ पर तो 12 से अधिक भाषाओं में फिल्में बन चुकी हैं और सभी सफल रही हैं. उनकी ‘चरित्रहीन’ पर बना धारावाहिक भी दूरदर्शन पर सफल रहा. ‘चरित्रहीन’ को जब उन्होंने लिखा था तब उन्हें काफी विरोध का सामना करना पड़ा था क्योंकि उसमें उस समय की मान्यताओं और परंपराओं को चुनौती दी गयी थी। हिंदी में  देवदास को आधार बनाकर देवदास फ़िल्म का निर्माण तीन बार हो चुका है।इसके अतिरिक्त  चरित्रहीन, परिणीता(दो बार ) और  में भी, बड़ी दीदी (१९६९) तथा मँझली बहन, आदि पर भी चलचित्रों के निर्माण हुए हैं। उनकी स्त्री पात्र पुरुष पात्र की तुलना में काफी सशक्त होती थीं ,वहीँ पुरुष पात्र भटका हुआ ,अस्थिर और उलझा हुआ सा।  विचारणीय है की ये कहानिया जिस दौर में लिखी गयीं थी उस वक़्त औरतों का समाज में स्थान नगण्य था।







अश्‍वत्थामा

आज कथा महाभारत से -
अश्वथामा
द्रोणाचार्य जी अनेक स्थानो मे भ्रमण करते हुए हिमालय (ऋषिकेश) प्‌हुचे।वहा तमसा नदी के किनारे एक दिव्य गुफा मे तपेश्वर नामक स्वयंभू  शिवलिग है ।यहाँ  गुरु द्रोणाचार्य जी और उनकी पत्नी  कृपि ने शिवजी की तपस्या की। इनकी तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने इन्हे पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया।कुछ समय बाद माता कृपि ने एक सुन्दर तेजस्वी  बाल़क को जन्म दिया। जन्म ग्रहण करते ही इनके कण्ठ से हिनहिनाने की सी ध्वनि हुई जिससे इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा। जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में एक अमूल्य मणि विद्यमान थी |जो कि उसे दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय रखती थी।
  पुत्र के जन्म पर द्रोण को महान प्रसन्नता हुई और उन्होंने योग्य विप्रों को सहस्त्रों गायें व धन दान में दिया। इससे स्पष्ट है कि उस समय द्रोण समय धन का अभाव नहीं था। कुछ समय बाद ही द्रोण परशुराम जी से विद्या प्राप्‍त करने गये । घर की आर्थिक स्थिति गिरती गयी और विपन्नता आ गयी । द्रोण आश्रम से लौटे तो घर में गाय तक न थी । अन्य ऋषि कुमारों को दूध पीते देख अश्‍वत्थामा दूध के हेतु रोता था और एक दिन द्रोण ने देखा कि ऋषि कुमार चावल के आटे का घोल बनाकर अश्‍वत्थामा को पिला चुके है और अवोध बालक – मैंने दूध पी लिया – यह कहते हुए आनन्दित हो रहा है । यह देख द्रोण स्वयं को धिक्कार उठे। उन्हें स्मरण हो आया  कि वो और द्रुपद एक ही आश्रम में थे और द्रुपद ने कहा था की जब वह राजा बनेगा तो आधा राज्य अपने मित्र द्रोण को दे देगा। बालक के लिए गाय की व्यवस्था हेतु द्रोण स्थान-स्थान पर घूमे, पर धर्मयुक्त दान नहीं मिला और वे अपने बाल – सखा द्रपुद के पास जाने को उद्यत हुए। परन्तु द्रुपद जो अब राजा बन चुका था ,ने भरे दरबार में  उनका मजाक बना दिया। 
अश्‍वत्थामा को लेकर द्रोण पाञ्चाल राज्य से कुरु राज्य में हस्तिनापुर आ गये और उसका युवावस्था तक का जीवन हस्तिनापुर में बीता। महाभारत में उल्लेख है कि द्रोण के कुरु कुमारों के आचार्य बनने से पूर्व कृप उन्हें शिक्षा देते थे और अश्‍वत्थामा भी कुरु कुमारों को बाण विद्या सिखाते थे। द्रोण फिर कौरवों और पांडवों के आचार्य हुए और अपने प्रिय शिष्यों को महारथी बनाकर जब उसे लाया गया तो उसका आधा राज्य लौटाकर उन्होंने उदारता का परिचय दिया। उत्तर पाञ्चाल का आधा राज्‍य लेकर द्रोण ने अश्‍वत्‍थामा को दे दिया, इसकी राजधानी अहिच्‍छ्त्र थी ।अश्‍वत्थामा को भी द्रोण ने धनुर्वेद के सारे रहस्य बता दिये। सारे दिव्यास्त्र, आग्नेय, वरुणास्त्र, पर्जन्यास्त्र , वायव्यास्त्र , ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, ब्रह्मशिर आदि इसे सिध्द हो गये और द्रोण, भीष्म, परशुराम की कोटि का धनुर्धर वह बन गया। कृप, अर्जुन व कर्ण भी उसे अधिक श्रेष्ठ नहीं थे ।नारायणास्त्र का प्रयोग तो द्रोण के अतिरिक्त और किसी को ज्ञात नहीं । इसी का प्रयोग अश्‍वत्थामा अपने पिता की मृत्यु पर क्रुध्द हो पाण्डव पक्ष पर करता है ।

अश्‍वत्थामा के ब्रह्मतेज, वीरता, धैर्य, तितिक्षा, शस्त्रज्ञान, नीतिज्ञान, बुध्दिमत्ता के विषय में किसी को संदेह नहीं है । महाभारत काल के सभी प्रमुख व्यक्ति अश्‍वत्थामा के बल, बुध्दि व शील के प्रशंसक हैं।
भीष्म रथियों व अतिरथियों की गणना करते हुए राजा दुर्योधन से अश्‍वत्थामा के बारे में कहते हैं कि महाभारत के युध्द को पूर्णता और परिणति को यही वीर पहुंचाएगा और उनका यह कथन सत्य निकला। 
द्रौण को अपने पुत्र अश्वत्थामा से बहुत प्यार था। शिक्षा में भी अन्य छात्रों से भेदभाव करते थे। जब उन्हें सभी कौरव और पांडव राजकुमारों को चक्रव्यूह की रचना और उसे तोडऩे के तरीके सिखाने थे, उन्होंने शर्त रख दी कि जो राजकुमार नदी से घड़ा भरकर सबसे पहले पहुंचेगा, उसे ही चक्रव्यूह की रचना सिखाई जाएगी। सभी राजकुमारों को बड़े घड़े दिए जाते लेकिन अश्वत्थामा को छोटा घड़ा देते ताकि वो जल्दी से भरकर पहुंच सके। सिर्फ अर्जुन ही ये बात समझ पाया और अर्जुन भी जल्दी ही घड़ा भरकर पहुंच जाते। 


जब ब्रह्मास्त्र का उपयोग करने की बारी आई तो भी द्रौणाचार्य के पास दो ही लोग पहुंचे। अर्जुन और अश्वत्थामा। अश्वत्थामा ने पूरे मन से इसकी विधि नहीं सीखी। ब्रह्मास्त्र चलाना तो सीख लिया लेकिन लौटाने की विधि नहीं सीखी। उसने सोचा गुरु तो मेरे पिता ही हैं। कभी भी सीख सकता हूं। द्रौणाचार्य ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा। जब महाभारत युद्ध के बाद अर्जुन और अश्वत्थामा ने एक-दूसरे पर ब्रह्मास्त्र चलाया। वेद व्यास के कहने पर अर्जुन ने तो अपना अस्त्र लौटा लिया लेकिन अश्वत्थामा ने नहीं लौटाया क्योंकि उसे इसकी विधि नहीं पता थी। जिसके कारण उसे शाप मिला। उसकी मणि निकाल ली गई और कलयुग के अंत तक उसे धरती पर भटकने के लिए छोड़ दिया गया। 

अगर द्रौणाचार्य अपने पुत्र मोह पर नियंत्रण रखकर उसे शिक्षा देते, उसके और अन्य राजकुमारों के बीच भेदभाव नहीं करते तो शायद अश्वत्थामा को कभी इस तरह सजा नहीं भुगतनी पड़ती।

महाभारत युद्ध में ये कौरव-पक्ष के एक सेनापति थे। उन्होंने भीम-पुत्र घटोत्कच को परास्त किया तथा घटोत्कच पुत्र अंजनपर्वा का वध किया। उसके अतिरिक्त द्रुपदकुमार, शत्रुंजय, बलानीक, जयानीक, जयाश्व तथा राजा श्रुताहु को भी मार डाला था। उन्होंने कुंतीभोज के दस पुत्रों का वध किया। पिता-पुत्र की जोडी ने महाभारत युध्द के समय पाण्डव सेना को तितर-बितर कर दिया।पाण्डवो की सेना की हार देख़कर श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कुट-निति सहारा लेने को कहा।इस योजना के तहत यह बात फेला दी गई कि "अश्वत्थामा मारा गया" जब गुरु द्रोणाचार्य ने धर्मराज युधिष्ठिर से अश्वत्थामा की सत्यता जानना चाही तो उन्होने जवाब दिया-"अश्वत्थामा मारा गया परन्तु हाथी"॥ श्रीकृष्ण ने उसी समय शन्खनाद किया,जिसके शोर से गुरु द्रोणाचार्य आखरी शब्द नही सुन पाए।अपने प्रिय पुत्र की मोत का समाचार सुनकर आपने शस्त्र त्याग दिये और युध्द भूमि मे आखे बन्द कर शोक अवस्था मे बेट गये।गुरु द्रोणाचार्य जी को निहत्ता जानकर द्रोपदी के भाई द्युष्टद्युम्न ने तलवार से आपका सिर काट डाला। गुरु द्रोणाचार्य जी की निर्मम हत्या के बाद पांडवों की जीत होने लगी।इस तरह महाभारत युद्ध में अर्जुन के तीरों एवं भीमसेन की गदा से कौरवों का नाश हो गया।दुष्ट और अभिमानी दुर्योधन की जाँघ भी भीमसेन ने मल्लयुद्ध में तोड़ दी। अपने दुर्योराजा धन की ऐसी दशा देखकर और अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का स्मरण कर अश्वत्थामा अधीर हो गया। दुर्योधन पानी को बान्धने की कला जानता था।सो जिस तालाब के पास गदायुध्द चल रहा था उसी तालाब मे घुस गया और पानी को बान्धकर छुप गया।दुर्योधन के पराजय होते ही युद्ध में पाण्डवो की जीत पक्की हो गई थी सभी पाण्डव खेमे के लोग जीत की खुशी मे मतवाले हो रहे थे। घायल अवस्था में दुर्योधन ने अश्वथामा को सेनापति नियुक्त किया।उलूक द्वारा रात्रि में कौवों पर आक्रमण कर उनके विनाश से द्रोणि को रात्रि में आक्रमण करने की प्रेरणा मिलती है।  उस रात्रि अश्वथामा ने जो कु कृत्य किया उसके चलते उसे तीनो जहां में जगह नहीं मिली और वह मौत को भी तरसता रह गया।शिविर पर रात में आक्रमण की योजना द्रोणि ने बनायी, कृप और कृतवर्मा को विवश हो उसका साथ देना पडा । वे दोनों शिविर द्वार पर खडे हो गये, केवल अश्‍वत्थामा भीतर गया। अश्‍वत्थामा ने वहाँ धृष्टद्युम्न को सोते से चरण प्रहार करके जगाय और लात-धूंसों के प्रहारों से मार डाला। शोर सुनकर प्रहरी जाग गये, स्त्रियाँ चिल्लाने लगीं। योध्दा शस्त्र सज्जित होने लगे। इस बीच उत्तमौजा को भी द्रोणि ने मार डाला। किन्तु इसके बाद तो सभी जाग गये और चारो ओर से अश्‍वत्थामा पर प्रहार करने वीर जा पहूँचे, किन्तु उसने युध्द करते हुए युधामन्यु, सुतसोम, शतानीक, श्रुतकर्मा, और शिखण्डी को मार डाला। योध्दा जब शिविर से भागने लगे तो कृप और कृतवर्मा ने तीन ओर से आग लगा दी और द्वार पर खडे हो गये, भागते हुए योध्दाओं को यमलोक पहुंचाने लगे। . 
 उसने रात के अँधेरे में पांडवों के खेमे में जा कर पांचो भाइयों के सर काट दुर्योधन के पास ले गया। अँधेरे में ही दुर्योधन ने भीम के सर को मुक्के से फोड़ा जो तरबूज की भाँती फूट गया। दुर्योधन तुरंत समझ गया कि इसने  पांडव पुत्रों की हत्या कर दिया है ,विव्हल हो उसने कहा भी नराधम तुमने हमे वंशहीन कर दिया। 


शिविर को तहस-नहस करके अश्‍वत्थामा पलायन कर जाता है, किन्तु क्रुध्द भीम वेगवार रथ से उसका पीछा करते हैं जब भीम अश्‍वत्थामा का पीछा करते हुए जाते है तो श्रीकृष्ण अर्जुन व युधिष्ठिर को सावधान करते है कि हमें अश्‍वत्थामा के स्वभाव को देखते हुए भीम को एकाकी और अरक्षित नहीं छोडना चाहिए ।वे उसके स्वभाव का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वह चपल, क्रूर, दिव्यास्त्रवान किन्तु दुरात्मा है ।
ब्रह्‍मशिर नामक अस्त्र का ज्ञान द्रोण ने प्रिय अर्जुन को दिया है यह जानकर अश्‍वत्थामा ने भी इसके लिए हठ किया तब द्रोण ने पुत्र हठ मानते हुए उसे अप्रसन्न्तापूर्वक यह अस्त्र दिया और सावधान किया इसका प्रयोग महान विपत्ति में भी पडकर नहीं करना चाहिए और मनुष्यों के विरुध्द तो कभी नही  .

भीम अश्‍वत्थामा को व्यास जी के आश्रम में पा जाते हैं और उनमे उग्र वार्तालाप होता है । इसी बीच श्रीकृष्ण व अर्जुन भी आ जाते हैं उन तीनों को देख अश्‍वत्थामा के हृदय में भय का संचार होता है । चूँकि उस समय वह मुनिवेश में है, शस्त्र, अस्त्र धारण नहीं किये है, अतः बचने के लिए वह ब्रह्‍मशिर नामक दिव्यास्त्र का आह्‍वान करता हैं। उधर श्रीकृष्ण की आज्ञा से अर्जुन भी ब्रह्‍मास्त्र इसके प्रतिकार में चला देते हैं । दोनों दिव्यास्त्र आकाश में टकराने चले जाते हैं तो व्यास व नारद मुनि प्रकट हो दोनों वीरों को आदेश देते हैं कि यह महाविनासकारी कृत्य न करो । अपने-अपने अस्त्र लौटाओ ।

अर्जुन ऋषि की आज्ञा से ब्रह्‍मास्त्र का प्रतिसंहरण करते है, किन्तु अश्‍वत्थामा प्रयास करने पर भी विफल रहता है । अपनी विवशता ऋषि को बताता है । वे उसकी निन्दा करते हैं । तब अश्‍वत्थामा कहता है कि पाण्डुपुत्रों की वध की कामना से उठाया गया यह अस्त्र किसी पाण्डव पर न गिरे यह गर्भस्थ पाण्डुवंशी पर गिंरे। व्यास कहते हैं कि अब इसी वुध्दि में स्थिर रहो ताकि दिव्यास्त्र गर्भ पर गिरकर ही शान्त हो जाये और इस प्रकार अपनी विवशता व ऋषि की सम्मति से वह प्रहार होता है, ताकि पाँचो पाण्डव बच जायें ।तब भगवान व्यास उसे आदेश देते हैं  कि तुम अपने शिर की मणि दे दो, अस्त्र त्यागो, पाण्डव तुम्हें प्राणदान दे देंगे । वह कहता है भगवन आपकी आज्ञा शिरोधार्य है, यह रही मणि और यह रहा मैं । किन्तु दिव्यास्त्र कैसे रोकूँ, यह तो अमोघ है। वह दिव्यास्त्र  जा  कर  उत्तरा के गर्भ  से  टकरा  गया। 
 अश्‍वत्थामा के इस कृत्य पर भगवान श्री कृष्ण को बहुत क्रोध आता है । वे उसकी निन्दा करते हैं, उसे कायर, पापी, वालघाती बताते हैं और शाप देते हैं कि तुम ३०००वर्षों तक भूतल पर निर्जन स्थानों में भटकते रहोगे, तुम्हारे शरीर से पीप तथा रक्त की गंध आती रहेगी , तुम्हें किसी का साथ नही मिलेगा। अभिशप्‍त अश्‍वत्थामा व्यास जी से कहता है जो भी भगवान पुरूषोत्तम ने कहा वह सत्य हो। हे भगवान मैं अब आपके अतिरिक्त किसी पुरूष के साथ नहीं रहूँगा। यह कहकर विषादयुक्त मन से अश्‍वत्थामा वन को चला गया। इस प्रकार हिंसा और अभिशाप में क्रोध और विषाद में इस महान विद्वान् और दुर्धर्ष वीर की कथा का समापन होता है।
कृप,कृतवर्मा  तथा द्रौणि तीनों ने महाविनाश कर यह संवाद दुर्योधन से कहा फिर राजा धृतराष्ट्र को बताया और कहा कि हम तीन हैं और पाण्डव पाँच हैं और कोई नहीं बचा ।

फिर वे तीनों दिशाओं में चले गये कृप हस्तिनापुर गये, कृतवर्मा द्वारिका तथा द्रौणि व्यास के साथ वन चले गये ।
 कहतें हैं अस्वथामा आज भी जिन्दा है और जंगलो और पहाड़ो में भटकता है।  







शनिवार, 13 सितंबर 2014

हिंदी दिवस पर विशेष

अपने माता-पिता ,भाई -बहन ,धर्म ,देश ,भाषा -बोली इत्यादि हम चुनते नहीं हैं बल्कि वे जन्म से हमसे जुड़े होते हैं। ये हमारी पहचान होतें हैं।  समय के साथ हम विभिन्न भाषाओँ पर अपना अधिकार जमाते हैं। पर मातृ भाषा एक ही रहती है। आज हिंदी भाषी लोग अपनी मातृभाषा में बोलने में शर्म महसूस करते हैं और दूसरी भाषाओं के उपयोग में शान। हिंदी के प्रति यही हीन भावना उसे गर्त में डुबो रही है। दूसरे भाषाओँ से कोई प्रतियोगिता नहीं है ,भाषाओँ के स्तर पर कोई ऊँच -नीच नहीं हैं। भाषा महज सम्प्रेषण का,अपनी भावनाओं और  विचारों को आदान-प्रदान करने का माध्यम भर है। भावना और विचार अच्छे होने चाहिए ,कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस बोली में बोल रहें हैं। आप दुनिया के दस भाषाओँ का ज्ञान रखें ,उन्हें उपयोग भी करें पर अपनी भाषा का कभी निरादर ना करे। आज अपनी ही देश में जहां हिंदी भाषी बहुलता से हैं हम "हिंदी दिवस"मना रहें हैं क्यों कि वह आज अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। अपनी बोली और भाषा से प्रेम करें ,उसपर गर्व करें। जैसे अपने माता-पिता हर हाल में आदरणीय  हैं वैसे ही अपनी भाषा भी। हमारे लिए ये गर्व की बात है कि हमारे नए प्रधानमंत्री जी हिंदी से उतना ही प्रेम करते हैं जितना अपनी देश से,जो विदेशों में भी जा कर अपने विचार अपनी बोली में व्यक्त कर रहें हैं और ज्यादा सम्मान कमा रहें हैं। अतः मित्रों जहां तक हो सके अपनी भाषा हिंदी में सम्प्रेषण करे ,हिंदी साहित्य पढ़े -लिखे और तनिक भी हीनभावना ना महसूस करें यदि आप हिंदी के अलावा दूसरी भाषा नहीं जानते हों। हिंदी हिन्दुस्तानियों की पहचान है -गर्व है। 

बुधवार, 10 सितंबर 2014

रश्मिरथी / तृतीय सर्ग / भाग 5- Ramdhari singh Dinkar

सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
शूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं।

मुख से न कभी उफ कहते हैं,
संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं,
उद्योग-निरत नित रहते हैं,
शूलों का मूल नसाने को,
बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।

है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।

गुण बड़े एक से एक प्रखर,
हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,
वर्तिका-बीच उजियाली हो।
बत्ती जो नहीं जलाता है
रोशनी नहीं वह पाता है।

पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड,
झरती रस की धारा अखण्ड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार,
बनती ललनाओं का सिंगार।
जब फूल पिरोये जाते हैं,
हम उनको गले लगाते हैं।
..........
वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।
मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

'दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!
दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशिष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
'जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

'उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

'दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।
'शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

'भूलोक, अतल, पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, कहाँ इसमें तू है।

'अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

'जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
छा जाता चारों ओर मरण।

'बाँधने मुझे तो आया है,
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

'हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

'टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।

'भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।'

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,
दोनों पुकारते थे 'जय-जय'!
भगवान सभा को छोड़ चले,
करके रण गर्जन घोर चले
सामने कर्ण सकुचाया सा,
आ मिला चकित भरमाया सा
हरि बड़े प्रेम से कर धर कर,
ले चढ़े उसे अपने रथ पर

रथ चला परस्पर बात चली,
शम-दम की टेढी घात चली,
शीतल हो हरि ने कहा, "हाय,
अब शेष नही कोई उपाय
हो विवश हमें धनु धरना है,
क्षत्रिय समूह को मरना है

"मैंने कितना कुछ कहा नहीं?
विष-व्यंग कहाँ तक सहा नहीं?
पर, दुर्योधन मतवाला है,
कुछ नहीं समझने वाला है
चाहिए उसे बस रण केवल,
सारी धरती कि मरण केवल

"हे वीर ! तुम्हीं बोलो अकाम,
क्या वस्तु बड़ी थी पाँच ग्राम?
वह भी कौरव को भारी है,
मति गई मूढ़ की मरी है
दुर्योधन को बोधूं कैसे?
इस रण को अवरोधूं कैसे?

"सोचो क्या दृश्य विकट होगा,
रण में जब काल प्रकट होगा?
बाहर शोणित की तप्त धार,
भीतर विधवाओं की पुकार
निरशन, विषण्ण बिल्लायेंगे,
बच्चे अनाथ चिल्लायेंगे

"चिंता है, मैं क्या और करूं?
शान्ति को छिपा किस ओट धरूँ?
सब राह बंद मेरे जाने,
हाँ एक बात यदि तू माने,
तो शान्ति नहीं जल सकती है,
समराग्नि अभी तल सकती है

"पा तुझे धन्य है दुर्योधन,
तू एकमात्र उसका जीवन
तेरे बल की है आस उसे,
तुझसे जय का विश्वास उसे
तू संग न उसका छोडेगा,
वह क्यों रण से मुख मोड़ेगा?

"क्या अघटनीय घटना कराल?
तू पृथा-कुक्षी का प्रथम लाल,
बन सूत अनादर सहता है,
कौरव के दल में रहता है,
शर-चाप उठाये आठ प्रहार,
पांडव से लड़ने हो तत्पर
"माँ का सनेह पाया न कभी,
सामने सत्य आया न कभी,
किस्मत के फेरे में पड़ कर,
पा प्रेम बसा दुश्मन के घर
निज बंधू मानता है पर को,
कहता है शत्रु सहोदर को

"पर कौन दोष इसमें तेरा?
अब कहा मान इतना मेरा
चल होकर संग अभी मेरे,
है जहाँ पाँच भ्राता तेरे
बिछुड़े भाई मिल जायेंगे,
हम मिलकर मोद मनाएंगे

"कुन्ती का तू ही तनय ज्येष्ठ,
बल बुद्धि, शील में परम श्रेष्ठ
मस्तक पर मुकुट धरेंगे हम,
तेरा अभिषेक करेंगे हम
आरती समोद उतारेंगे,
सब मिलकर पाँव पखारेंगे

"पद-त्राण भीम पहनायेगा,
धर्माचिप चंवर डुलायेगा
पहरे पर पार्थ प्रवर होंगे,
सहदेव-नकुल अनुचर होंगे
भोजन उत्तरा बनायेगी,
पांचाली पान खिलायेगी

"आहा ! क्या दृश्य सुभग होगा !
आनंद-चमत्कृत जग होगा
सब लोग तुझे पहचानेंगे,
असली स्वरूप में जानेंगे
खोयी मणि को जब पायेगी,
कुन्ती फूली न समायेगी

"रण अनायास रुक जायेगा,
कुरुराज स्वयं झुक जायेगा
संसार बड़े सुख में होगा,
कोई न कहीं दुःख में होगा
सब गीत खुशी के गायेंगे,
तेरा सौभाग्य मनाएंगे

"कुरुराज्य समर्पण करता हूँ,
साम्राज्य समर्पण करता हूँ
यश मुकुट मान सिंहासन ले,
बस एक भीख मुझको दे दे
कौरव को तज रण रोक सखे,
भू का हर भावी शोक सखे

सुन-सुन कर कर्ण अधीर हुआ,
क्षण एक तनिक गंभीर हुआ,
फिर कहा "बड़ी यह माया है,
जो कुछ आपने बताया है
दिनमणि से सुनकर वही कथा
मैं भोग चुका हूँ ग्लानि व्यथा

"मैं ध्यान जन्म का धरता हूँ,
उन्मन यह सोचा करता हूँ,
कैसी होगी वह माँ कराल,
निज तन से जो शिशु को निकाल
धाराओं में धर आती है,
अथवा जीवित दफनाती है?

"सेवती मास दस तक जिसको,
पालती उदर में रख जिसको,
जीवन का अंश खिलाती है,
अन्तर का रुधिर पिलाती है
आती फिर उसको फ़ेंक कहीं,
नागिन होगी वह नारि नहीं
"हे कृष्ण आप चुप ही रहिये,
इस पर न अधिक कुछ भी कहिये
सुनना न चाहते तनिक श्रवण,
जिस माँ ने मेरा किया जनन
वह नहीं नारि कुल्पाली थी,
सर्पिणी परम विकराली थी

"पत्थर समान उसका हिय था,
सुत से समाज बढ़ कर प्रिय था
गोदी में आग लगा कर के,
मेरा कुल-वंश छिपा कर के
दुश्मन का उसने काम किया,
माताओं को बदनाम किया

"माँ का पय भी न पीया मैंने,
उलटे अभिशाप लिया मैंने
वह तो यशस्विनी बनी रही,
सबकी भौ मुझ पर तनी रही
कन्या वह रही अपरिणीता,
जो कुछ बीता, मुझ पर बीता

"मैं जाती गोत्र से दीन, हीन,
राजाओं के सम्मुख मलीन,
जब रोज अनादर पाता था,
कह 'शूद्र' पुकारा जाता था
पत्थर की छाती फटी नही,
कुन्ती तब भी तो कटी नहीं

"मैं सूत-वंश में पलता था,
अपमान अनल में जलता था,
सब देख रही थी दृश्य पृथा,
माँ की ममता पर हुई वृथा
छिप कर भी तो सुधि ले न सकी
छाया अंचल की दे न सकी

"पा पाँच तनय फूली फूली,
दिन-रात बड़े सुख में भूली
कुन्ती गौरव में चूर रही,
मुझ पतित पुत्र से दूर रही
क्या हुआ की अब अकुलाती है?
किस कारण मुझे बुलाती है?

"क्या पाँच पुत्र हो जाने पर,
सुत के धन धाम गंवाने पर
या महानाश के छाने पर,
अथवा मन के घबराने पर
नारियाँ सदय हो जाती हैं
बिछुडोँ को गले लगाती है?

"कुन्ती जिस भय से भरी रही,
तज मुझे दूर हट खड़ी रही
वह पाप अभी भी है मुझमें,
वह शाप अभी भी है मुझमें
क्या हुआ की वह डर जायेगा?
कुन्ती को काट न खायेगा?

"सहसा क्या हाल विचित्र हुआ,
मैं कैसे पुण्य-चरित्र हुआ?
कुन्ती का क्या चाहता ह्रदय,
मेरा सुख या पांडव की जय?
यह अभिनन्दन नूतन क्या है?
केशव! यह परिवर्तन क्या है?

"मैं हुआ धनुर्धर जब नामी,
सब लोग हुए हित के कामी
पर ऐसा भी था एक समय,
जब यह समाज निष्ठुर निर्दय
किंचित न स्नेह दर्शाता था,
विष-व्यंग सदा बरसाता था

"उस समय सुअंक लगा कर के,
अंचल के तले छिपा कर के
चुम्बन से कौन मुझे भर कर,
ताड़ना-ताप लेती थी हर?
राधा को छोड़ भजूं किसको,
जननी है वही, तजूं किसको?

"हे कृष्ण ! ज़रा यह भी सुनिए,
सच है की झूठ मन में गुनिये
धूलों में मैं था पडा हुआ,
किसका सनेह पा बड़ा हुआ?
किसने मुझको सम्मान दिया,
नृपता दे महिमावान किया?

"अपना विकास अवरुद्ध देख,
सारे समाज को क्रुद्ध देख
भीतर जब टूट चुका था मन,
आ गया अचानक दुर्योधन
निश्छल पवित्र अनुराग लिए,
मेरा समस्त सौभाग्य लिए

"कुन्ती ने केवल जन्म दिया,
राधा ने माँ का कर्म किया
पर कहते जिसे असल जीवन,
देने आया वह दुर्योधन
वह नहीं भिन्न माता से है
बढ़ कर सोदर भ्राता से है

"राजा रंक से बना कर के,
यश, मान, मुकुट पहना कर के
बांहों में मुझे उठा कर के,
सामने जगत के ला करके
करतब क्या क्या न किया उसने
मुझको नव-जन्म दिया उसने

"है ऋणी कर्ण का रोम-रोम,
जानते सत्य यह सूर्य-सोम
तन मन धन दुर्योधन का है,
यह जीवन दुर्योधन का है
सुर पुर से भी मुख मोडूँगा,
केशव ! मैं उसे न छोडूंगा

"सच है मेरी है आस उसे,
मुझ पर अटूट विश्वास उसे
हाँ सच है मेरे ही बल पर,
ठाना है उसने महासमर
पर मैं कैसा पापी हूँगा?
दुर्योधन को धोखा दूँगा?

"रह साथ सदा खेला खाया,
सौभाग्य-सुयश उससे पाया
अब जब विपत्ति आने को है,
घनघोर प्रलय छाने को है
तज उसे भाग यदि जाऊंगा
कायर, कृतघ्न कहलाऊँगा

"कुन्ती का मैं भी एक तनय,
जिसको होगा इसका प्रत्यय
संसार मुझे धिक्कारेगा,
मन में वह यही विचारेगा
फिर गया तुरत जब राज्य मिला,
यह कर्ण बड़ा पापी निकला

"मैं ही न सहूंगा विषम डंक,
अर्जुन पर भी होगा कलंक
सब लोग कहेंगे डर कर ही,
अर्जुन ने अद्भुत नीति गही
चल चाल कर्ण को फोड़ लिया
सम्बन्ध अनोखा जोड़ लिया

"कोई भी कहीं न चूकेगा,
सारा जग मुझ पर थूकेगा
तप त्याग शील, जप योग दान,
मेरे होंगे मिट्टी समान
लोभी लालची कहाऊँगा
किसको क्या मुख दिखलाऊँगा?

"जो आज आप कह रहे आर्य,
कुन्ती के मुख से कृपाचार्य
सुन वही हुए लज्जित होते,
हम क्यों रण को सज्जित होते
मिलता न कर्ण दुर्योधन को,
पांडव न कभी जाते वन को

"लेकिन नौका तट छोड़ चली,
कुछ पता नहीं किस ओर चली
यह बीच नदी की धारा है,
सूझता न कूल-किनारा है
ले लील भले यह धार मुझे,
लौटना नहीं स्वीकार मुझे

"धर्माधिराज का ज्येष्ठ बनूँ,
भारत में सबसे श्रेष्ठ बनूँ?
कुल की पोशाक पहन कर के,
सिर उठा चलूँ कुछ तन कर के?
इस झूठ-मूठ में रस क्या है?
केशव ! यह सुयश - सुयश क्या है?

"सिर पर कुलीनता का टीका,
भीतर जीवन का रस फीका
अपना न नाम जो ले सकते,
परिचय न तेज से दे सकते
ऐसे भी कुछ नर होते हैं
कुल को खाते औ' खोते हैं